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Dhruv Rathee




[प्रशंसा] नमस्कार दोस्तों, आज मैं यहां आया हूं जर्मनी के शहर दस्तन में। लेकिन मैं यहां घूमने नहीं आया हूं बल्कि आपको यह दिखाने आया हूं कि कैसे हम लोगों ने आप लोगों ने 15 कैंसर पीड़ित लोगों की जान बचाई है। मजाक नहीं कर रहा। आपको सुनकर लग रहा होगा कि हैं ये कब हो गया। लेकिन एक्चुअली में आप लोगों ने जान बचाई है। ये बात है करीब एक साल पहले की जब मैंने कैंसर के ऊपर ये एजुकेशनल वीडियो बनाया था। इसमें मैंने कैंसर के प्रिवेंटेटिव स्टेप्स बताए थे। कैसे आप अपने आप को बचा सकते हो कैंसर होने से। लेकिन इसी वीडियो

में मैंने यह भी कहा था कि अगर एक छोटा सा काम आप मेरा ये कर दोगे तो हम कैंसर पीड़ित मरीजों की जान भी बचा सकते हैं। और आपने किया। आप में से 300 लोगों ने रजिस्टर किया जिसकी वजह से आज हम 15 लोगों की जान बचा पाए। एग्जैक्टली ये कैसे हुआ इसके पीछे एक हाईटेक लैब शामिल है जो यहां त्रिस्त में मौजूद है। आइए इसके पीछे की साइंस को थोड़ा डिटेल में समझते हैं और अगले साल के लिए टारगेट रखते हैं 150 जाने बचाने का। कैसे कर सकते हो आप? चलिए देखते हैं। यह पूरा मुद्दा है दोस्तों ब्लड कैंसर का। ब्लड कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसकी वजह से

इंडिया में हर साल 70,000 लोग मारे जाते हैं। हर साल 70000 लोगों की जाने जाती हैं। अगर यह बीमारी आपको हो जाए और आप पर कीमोथेरेपी और रेडिएशन जैसी ट्रीटमेंट्स फेल कर जाए तो आपकी जान बचाने का एक आखिरी ऑप्शन बचता है ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन। आपको किसी दूसरे इंसान के खून से स्टेम सेल्स लेने पड़ेंगे अपनी बॉडी में कैंसर से फाइट करने के लिए। यह प्रोसेस ब्लड ट्रांसफ्यूजन से काफी सिमिलर है जब आप ब्लड डोनेट करने जाते हो। लेकिन एक बहुत इंपॉर्टेंट डिफरेंस है। जब आपको सिर्फ साधारण खून की जरूरत होती है तो

सिर्फ आठ ही अलग-अलग प्रकार के कॉमन ब्लड टाइप्स होते हैं। ए पॉजिटिव, बी पॉजिटिव, ओ पॉजिटिव जैसे। तो एक सेम ब्लड ग्रुप का कोई इंसान मिलना इतना मुश्किल काम नहीं। लेकिन स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन के लिए आपका एचएलए टाइप मैच होना चाहिए। और एचएलए टाइप्स 20,000 से ज्यादा अलग-अलग प्रकार के होते हैं। ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के लिए मैच मिलना इतना मुश्किल है कि इसकी प्रोबेबिलिटी होती है वन आउट ऑफ 1 लाख। यानी कि यह लगभग इंपॉसिबल है अगर आप किसी को खुद से ढूंढने चलोगे ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन के लिए और इसीलिए यहां पर

आती है दोस्तों डीकेएमएस एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन जो दुनिया की लार्जेस्ट स्टेम सेल रजिस्ट्री बनाकर रखती है। यह बात है 9 जनवरी 2021 की जब मुंबई में रहने वाली साइली राणे को ब्लड कैंसर से डायग्नोस किया गया। लेट अराउंड 4:30 अ कॉल केम फ्रॉम माय लैब टू माय हस्बैंड। ही इन्फॉर्मड माय हस्बैंड दैट यू नो दिस इज द केस। तो फर्स्ट थिंग मेरे दिल में दिमाग में ये फीलिंग आई कि साहिली मुझे छोड़ के जा रही है। डॉक्टर ने पहले कीमोथेरेपी सजेस्ट करी लेकिन वो अच्छे से काम नहीं करा। फिर डॉक्टर ने कहा स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन

करना पड़ेगा। लेकिन साइली के परिवार में किसी का भी उसके साथ एचएलए टाइप मैच नहीं किया तो उसके पास स्टेम सेल डोनेशन के लिए कोई नहीं था। अनफॉर्चुनेटली व्हाट हैपेंड इज़ डेट माय ब्रदर एंड सिस्टर्स एचएलए मैच्ड बट इट डिडन्ट मैच विथ मी। फाइनेंस की अरेंजमेंट भी हो गई थी लकीली लेकिन डोनर नहीं मिला। डॉक्टर के एडवाइस करने पर उन्होंने डीकेएमएस को कांटेक्ट किया क्योंकि डीकेएमएस के पास 11 मिलियन से ज्यादा स्टेम सेल डोनर्स रजिस्टर्ड हैं और इसी वजह से उन्हें कुछ समय बाद एक डोनर मिल गया। विशाखापटनम के सतीश रेड्डी उनका

एचएलएटाई साहिली राणे के साथ मैच कर गया। सतीश ने अपने स्टेम सेल्स डोनेट किए और आज साली ना सिर्फ जिंदा है बल्कि एक हेल्दी लाइफ जी रही है। यू आर गिविंग अ लाइफ टू अ पर्सन दैट इज द बेस्ट डोनेशन। आई थिंक यू कैन डू इट इन योर लाइफ। नथिंग एल्स विल बी कंपेरेबल टू दैट। ऐसी ही एक कमाल की कहानी है अहमदाबाद के छ साल के महर की। इसे एक्यूट ल्यूकीमिया था। यह एक प्रकार का ब्लड कैंसर होता है और इसकी पूरी जिंदगी स्टेम सेल डोनेशन पर डिपेंड करती थी। महर इतना छोटा बच्चा था कि उसे पता भी नहीं था कि क्या हो रहा है। स्टेम सेल डोनर ढूंढने के लिए इसके

पेरेंट्स ने डीकेएमएस को कांटेक्ट किया और इनके जरिए महीर को जर्मनी में डॉक्टर सीता अर्जुना मिली। हजारों किलोमीटर दूर जाकर एक ऐसा इंसान मिला जिसके साथ उसका एचएलए टाइप मैच करता हो और इसी डोनेशन की मदद से महीर ठीक हो पाया। आज महीर एक 18 साल का नौजवान है और इसका कहना है कि आज मैं सिर्फ इसलिए जिंदा हूं क्योंकि इस एक डोनेशन ने मेरी जिंदगी बचाई। द ओनली रीज़न दैट आई एम अलाइव राइट नाउ एंड इन फ्रंट ऑफ यू इज द ब्लड डोनेशन। ब्लड स्टेम सेल डोनेशन। अब लोगों की इस तरीके से जान बचाने का यह प्रोसेस बड़ा सिंपल है दोस्तों जो मैंने पिछले वीडियो में भी

समझाया था और आपके लिए बिल्कुल फ्री ऑफ कॉस्ट है क्योंकि इसका पूरा खर्चा डीकेएमएस उठाता है। आपको बस इस वेबसाइट पर जाकर एक ऑनलाइन फॉर्म भरना है। इसका लिंक मैंने डिस्क्रिप्शन और पिंड कमेंट में डाल दिया है। इस फॉर्म में बस आपको अपनी बेसिक डिटेल्स भरनी है जिसमें सिर्फ 5 मिनट का समय लगेगा। इसके कुछ दिन बाद आपके घर में एक स्वॉब किट आएगी, जिसमें लिखा होगा कि आपको कैसे चीक स्वॉब लेना है। उसी तरह से चीक स्वप लेकर सैंपल को उसी स्वॉइप किट में पैक कर देना है साइन कंसेंट फॉर्म के साथ। और किट रिटर्न एनवेलप में दिए हुए

क्यूआर कोड को स्कैन करोगे तो इस स्वॉइप किट को आपके यहां से पिकअप कर लिया जाएगा। आपके घर कोई आएगा इस एनवेलप को दोबारा से पिकअप करने के लिए। यही सैंपल जो आप सबमिट करेंगे इसी के जरिए आपका एचएलए टाइप पता किया जाएगा और आपको ब्लड स्टेम सेल रजिस्ट्री में ऐड कर दिया जाएगा। इस पूरे प्रोसेस को होने में करीब 40 दिन का समय लगेगा और फिर आपको डीकेएमएस की तरफ से ईमेल आएगी कि आपको वर्ल्ड स्टेम सेल डोनर डेटाबेस में ऐड कर दिया गया है। इसके बाद अगर आपका एचएलए टाइप किसी ब्लड कैंसर के मरीज से मैच करता है तो आपको डीकेएमएस की

तरफ से कॉल आएगी। आपको ऑफर किया जाएगा कि आप डोनेट करो अपने स्टेम सेल्स। एक्जेक्टली ये प्रोसेस कैसे काम करता है? इसका लाइव एग्जांपल आगे वीडियो में देखते हैं। लेकिन इससे पहले जानते हैं जो पूरा साइंटिफिक प्रोसेस होता है आपके एचएलए टाइप को पता करने के लिए। यह सब कुछ होता है जर्मनी के एक बड़े हाईटेक लैब में जो यहां दिसल में मौजूद है। यह है डीकेएमएस लाइफ साइंस लैब। दुनिया भर से जितने भी लोग अपने स्वप सैंपल्स भेजते हैं वो सब यहां पर आकर प्रोसेस होते हैं। पिछले वीडियो में जब मैंने आप लोगों से रिक्वेस्ट करी थी आप में से करीब 30,000

लोगों ने अपने स्वैब सैंपल्स भेजे थे। वो सारे सैंपल्स लैब में सबसे पहले यहां पर आते हैं। सबसे पहली स्टेप ये बड़ी इंटरेस्टिंग है। ये एक स्लाइज़र मशीन का इस्तेमाल करते हैं आपकी इन चिट्ठियों को खोलने के लिए। ये मशीन सिर्फ इन एनवेलर्स को खोलने का काम करती है। अभी आगे-आगे आप देखेंगे कि ये पूरा प्रोसेस कितना ऑटोमेटेड है। ऐसी-ऐसी मशीनंस का इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका नाम आपने कभी नहीं सुना होगा। लेकिन दूसरी स्टेप जो होती है उसमें मैनुअल वर्क करना पड़ता है। इस स्टेप में सबसे ज्यादा कंसंट्रेशन की जरूरत होती है क्योंकि यह

सबसे इंपॉर्टेंट स्टेप है। यहां पर सैंपल को एनवेलप से निकाल कर एक प्लेट में लगाया जा रहा है। एक प्लेट जिसमें 96 जगह है लगाने की और इसे कंप्यूटर में भी इसी स्टेप पर रजिस्टर किया जा रहा है। अगर आप कंप्यूटर स्क्रीन को देखोगे तो वहां पर एग्जैक्टली दिखेगा कि इस प्लेट में कौन से स्पॉट पर सैंपल लगाया गया है। कौन से वाला। यह काम अभी के लिए इंसानों के द्वारा ही किया जा रहा है और बहुत कंसंट्रेशन के साथ करने की जरूरत है क्योंकि अगर गलत डाल दिया तो सैंपल्स मिक्स अप हो सकते हैं। फिर तीसरी स्टेप आती है डीएनए एक्सट्रैक्शन। इसके बाद

सैंपल्स वाले इस पैनल को इस मशीन में भेजा जाता है और यह मशीन डीएनए एक्सट्रेक्शन का काम करती है। आपने जो स्वाद सैंपल भेजा है उससे डीएनए को निकालने का काम। और ये डीएनए को निकालने का काम उस ब्राउन वाले लिक्विड से वहां से किया जाता है जो एक्चुअली में मैग्नेटिक बीड्स है जो मैग्नेट की तरह डीएनए को निकाल लेती है। फिर इस मशीन में डीएनए का क्वालिटी चेक होता है। आपने जो सॉफ्ट सैंपल निकाल के दिया है उसमें डीएनए की कंसंट्रेशन ज्यादा है या कम है ये मशीन चेक करती है और दो में डिवाइड कर देती है डीएनए सैंपल्स को।

इसलिए जो आप स्वॉप सैंपल लेते हो घर पर उसमें इंस्ट्रक्शंस को ढंग से फॉलो करना। अगर आपके स्वप सैंपल में डीएनए की सफिशिएंट मात्रा मौजूद नहीं है तो यह पूरा प्रोसेस एक तरीके से वेस्ट हो जाता है। और फिर आती है एक और कमाल की ऑटोमेटेड मशीन जिसका नाम है हाइड्रोसाइक्लन। वैसे यहां पर इतनी सारी ऑटोमेटेड मशीनंस है। इस वाली का काम है डीएनए का जो हिस्सा हमारे लिए रेलेवेंट है। एचएलए टाइपिंग के लिए रेलेवेंट है। उस हिस्से को मल्टीप्लाई कर देना ताकि उसे बाद में पढ़ना आसान हो जाए। ये एक मशीन एक सही टेंपरेचर पर एंजाइम्स

के साथ डीएनए को मल्टीप्लाई करती है और डीएनए को उस हिस्से को। और इंटरेस्टिंग चीज यह है कि यह तो पुराना वर्जन है इस मशीन का हाइड्रोसाइटर का। इसका नया वाला वर्जन देखो और छोटा बना दिया इन्होंने यहां पर और मॉडर्न वर्जन सेम मशीन का। अगली स्टेप आती है डीएनए की लेबलिंग करना। कुछ टेक्नोलॉजीस इतनी कमाल की होती है कि वो सुनने में बिल्कुल साइंस फिक्शन जैसी लगती है। लेकिन असलियत में पॉसिबल है। ये मशीन उसी का ही एक एग्जांपल है। इस मशीन के द्वारा हर एक डीएनए के सैंपल को बारकोड दिया जा रहा है। एक बारकोड उस पर अटैच

किया जा रहा है ताकि उसे बाद में आइडेंटिफाई किया जा सके कि वो वाला डीएनए कौन से डोनर से आया था। और यह जो बारकोड है यह डीएनए के अंदर ही लगाया जा रहा है। आपको बाहर से नहीं दिख रहा है। यह वाले बारकोड की मैं बात नहीं कर रहा हूं बल्कि ये मशीन हर एक सैंपल के अंदर अपना एक बारकोड लगा रही है उस लिक्विड के अंदर। यह इतनी कमाल की टेक्नोलॉजी है दोस्तों कि आने वाले टाइम में साइंटिस्ट देख रहे हैं कि कैसे डीएनए का इस्तेमाल किया जा सके डेटा स्टोरेज के लिए। जिस काम के लिए आज के दिन हम USB स्टिक्स, हार्ड ड्राइव्स और

बड़े-बड़े डाटा सेंटर्स का इस्तेमाल करते हैं, वही कंप्यूटर डाटा डीएनए में भी स्टोर किया जा सकता है जब इस डीएनए वाले बारकोड प्रोसेस का इस्तेमाल किया जाए तो क्योंकि हर एक डीएनए पर अपना बारकोड ऑलरेडी अटैच्ड है। तो हमें उन्हें सेपरेट जगह पर अलग-अलग स्टोर करने की जरूरत नहीं है। जगह बचाने के लिए हम उन्हें एक ही लिक्विड के अंदर भी स्टोर कर सकते हैं। और यही काम करती है ये वाली मशीन। सारे सैंपल्स का लिक्विड लिया और सभी को एक इस छोटी सी बोतल में स्टोर कर दिया। इस छोटी सी बोतल में दोस्तों 7000 डीएनए सैंपल स्टोर किए जा सकते हैं और इससे स्पेस

कितनी ज्यादा सेव होती है आप देख ही सकते हो। सारी डाटा स्टोरेज यहां लिक्विड फॉर्म में हो रही है। यह वाला कमरा काफी नॉइज़ है और यहां जो मशीनंस रखी है वो बहुत बहुत ज्यादा महंगी है। एक-एक मशीन की कॉस्ट हाफ अ मिलियन यूरोस है। लेकिन जो स्टेप है ये बहुत जरूरी भी है। ये सबसेेंट स्टेप है एक्चुअली क्योंकि इन्हीं मशीनंस में वो लिक्विड सैंपल्स डाले जाते हैं और ये डीएनए रीडिंग का काम किया जाता है। ये मशीनंस डीएनए को रीड करती है। एचएलए टाइपिंग पता करती है और उस सारी इनेशन को कंप्यूटर में स्टोर कर देती है। यहां पर

भी अलग-अलग वर्जनंस है मशीन के। ये वाला जैसे कि पुराना वाला है। ये वाला ज्यादा एडवांस वर्जन है। आप इसमें इसकी बाहर की लुक से ही देख सकते हो कि ये नया अपग्रेडेड मॉडल है। Pro Max की तरह और सारा डाटा निकाल कर फाइनली इस सर्वर में स्टोर किया जा रहा है। अब यह सारा प्रोसेस तो है दोस्तों सिर्फ ब्लड स्टेम सेल डोनर्स को कलेक्ट करने का एक रजिस्ट्री बनाने का। लेकिन जब एक्चुअली में डीकेएमएस को कोई मरीज मिलता है जिसका एचएलए टाइप आपके साथ मैच कर जाता है तो डीकेएमएस आपको कॉल करेगा। हो सकता है कॉल आपको एक महीने बाद आए या

फिर एक साल बाद आए या फिर यह भी हो सकता है कि आपको यह कॉल आए ही ना क्योंकि मैच मिलना बहुत रेयर होता है। लेकिन अगर आपको कॉल आती है तो कॉल के बाद आप डिसाइड कर सकते हो कि आपको अपने स्टेम सेल्स डोनेट करने हैं या नहीं करने। लेकिन अगर आप चूज़ करते हो डोनेट करने की तो आप लोगों की जान बचा सकते हो। पिछले वीडियो में आप में से करीब 30,000 लोगों ने रजिस्टर किया था। उनमें से 15 लोगों को कॉल आई और 15 लोगों ने डोनेशन करने का ऑप्शन चूज़ किया और यही कारण है दोस्तों कि हम सब मिलकर 15 कैंसर मरीजों की जान बचा पाए हैं।

अब जब एक्चुअली में स्टेम सेल डोनेशन का टाइम आएगा तो डीकेएमएस वाले लोग आपके नियरेस्ट कलेक्शन सेंटर में पहुंचने में आपकी मदद करेंगे। इंडिया में सारे मेट्रो शहरों में इनके हॉस्पिटल्स के साथ टाई अप हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बोर इन जगहों पर यह आपको ले जाएंगे अपने नियरेस्ट कलेक्शन सेंटर में डोनेट करने के लिए। लेकिन अगर आप किसी रिमोट एरिया में रहते हो जैसे कि लद्दाख में कहीं पर तो ये आपकी फ्लाइट के लिए पे करेंगे, होटल स्टे के लिए प्ले पे करेंगे और आप इनके नियरेस्ट कलेक्शन सेंटर में आ सकते हो ब्लड डोनेट

करने के लिए। लेकिन एक कलेक्शन सेंटर में आगे क्या होगा। तो यह पता करने के लिए आए हैं हम रेसन के डीकेएमएस के कलेक्शन सेंटर में। आइए देखते हैं यहां पर चीजें कैसे काम करती है। [संगीत] तो दिखने में मशीन बहुत ही हाईफाई लग रही है। लेकिन एक्चुअली में प्रोसेस काफी सिंपल है। ये एक सेंट्रीफ्यूगल की मशीन है। एक हाथ से आपका ब्लड लिया जाता है। ये मशीन ब्लड को तीन हिस्सों में सेपरेट कर देती है। रेड ब्लड सेल्स जो कि यहां आप डार्क लाइन में देख सकते हैं। दूसरा प्लाज्मा जो यहां की वाइट लाइन में मौजूद है। और तीसरा जो सबसे इंपॉर्टेंट चीज है

वो है स्टेम सेल्स जो इस ग्राउंड वाली लाइन में मौजूद है जो यहां जाकर इस पैकेट में कलेक्ट हो जाते हैं। सेम सेल सेपरेट करने के बाद जो बाकी का खून है वो वापस आपकी बॉडी में दे दिया जाता है दूसरे हाथ के थ्रू। यहां आप देख सकते हो मशीन खुली हुई है। अंदर से कैसी है। बेसिकली ये सेंट्रीफ्यूगल है जो ऐसे-ऐसे यहां घूमता रहता है और यहां पे कवरिंग आती है। इस पूरे प्रोसेस को होने में सिर्फ दो से तीन घंटे का समय लगता है और बिल्कुल भी पेनफुल प्रोसेस नहीं है। सिर्फ आपके यहां जब ब्लड निकालने के लिए सुई चुाई जाती है उसका थोड़ा सा दर्द है

जो नॉर्मल ब्लड डोनेशन में भी होता है। लेकिन उसके अलावा जो दो से तीन घंटे का समय है आप उसमें रिलैक्स कर सकते हो। आराम से मूवी देखो बैठ के इंटरनेट ब्राउज करो। जैसा कि ये सब लोग कर रहे हैं और इतना ही सिंपल काम है और जो आपकी बॉडी से स्टेम सेल्स लिए गए हैं उन्हें आपकी बॉडी को दोबारा बनाने में कुछ ज्यादा समय नहीं लगेगा। सिर्फ दो से तीन हफ्ते के अंदर ही वो वापस आ जाएंगे। सो डिड यू फील एनी पेन ड्यूरिंग द होल प्रोसेस जस्ट फर्स्ट या सो राइट नाउ यू डोंट फील एनी पेन। या तो इतना ही सिंपल काम है दोस्तों किसी की

जान बचाना। लेकिन अनफॉर्चूनेट चीज यह है कि इंडिया में हर साल 1 लाख से ज्यादा ब्लड कैंसर के केसेस देखने को मिलते हैं और पूरे देश भर में टोटल रजिस्टर्ड लोग सिर्फ 8 लाख हैं। तो ऐसे में एक्चुअली में किसी ब्लड कैंसर के मरीज को मैच मिल पाने का काफी कम चांस है अपने देश में क्योंकि बहुत कम लोगों ने रजिस्टर कर रखा है। इसलिए मैं कहूंगा दोस्तों अगर आप इस वीडियो को देख रहे हो तो प्लीज जाकर रजिस्टर करो। पिछले साल हमने 15 जाने बचाई थी। इस साल टारगेट रखते हैं 150 जाने बचाने का। इसके लिए आप में से 3 लाख लोगों को रजिस्टर करना पड़ेगा। तो उम्मीद करता

हूं आप में से इस वीडियो को देखने वाले ज्यादा से ज्यादा लोग रजिस्टर करेंगे और यह काम बिल्कुल फ्री ऑफ कॉस्ट है जैसा मैंने बताया। इतना छोटा सा एफर्ट किसी की जान बचा सकता है। यह काम करते वक्त दोस्तों बस इस चीज के बारे में सोचना कि अगर आपके परिवार में किसी को ब्लड कैंसर हो जाता तो आपको कैसा फील होता। इतना छोटा सा एफर्ट इतना बड़ा इंपैक्ट डाल सकता है। आइए मिलकर जिंदगियां बचाते हैं। अगर यह वीडियो इनफेटिव लगा तो यह वाला वीडियो भी जरूर देखिए दोस्तों जिसमें मैंने डिटेल में कैंसर की बात करी है। कैसे आप अपने आप

को कैंसर होने से बचा सकते हैं। कौन सी प्रिवेंशन की स्टेप्स ले सकते हैं। यहां क्लिक करके देख सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद। [संगीत]